PAGES

Sunday, August 31, 2014

दुनियादारी से रश्क

हमने ज़ाहिर किया और कबूल था उन्हें भी ये इश्क़ 
पर दस्तूर-ए-दुनिया से परहेज़ कैसे रोक पाते अपने अश्क़ 
रो रोके बिताये पल कई, और रोकर होगये आँखें खुश्क 
अब बैठे है हार कर, है तो है बस इस दुनियादारी से रश्क 
जो मेरी आशिक़ का दिल जीत गया, और हमे दिया सूखे अश्क़

No comments:

Post a Comment