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Sunday, September 2, 2012

नज्म-ए-मोहब्बत

माहिर नही हूँ इतना की तेरी हुस्न का कमाल ज़ाहिर करू
लियाक़त नही ख़ुद मैं इतनी की तेरी नशे का मिसाल अर्ज़ करू
कशिश नही इतनी लफ्जों मैं, की तेरी कशिश बयान करू
नज्म-ए-मोहब्बत न समझो इसे, ये तो युंही लिख दिया हमने
वो नज़्म कभी तो लिखू जिसमे तेरी हर अदा बयान करू

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